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तुलसीदास का जीवन परिचय | तुलसीदास कवि परिचय दो रचनाएं, भाव पक्ष, कला पक्ष व साहित्य में स्थान

तुलसीदास दास जी का कवि/जीवन परिचय :

दोस्तों इस पोस्ट मे आपको तुलसीदास जी का कवि परिचय बताया गया है।  तुलसीदास हिन्दी साहित्य के महान कवियों में से एक थे ।  उन्होंने रामचरित मानस जैसे महाकाव्य की रचना कर हिन्दी साहित्य को एक अमूल्य धरोहर भेंट की है । तो आइए जानते है महाकवि तुलसीदास जी के जीवन के बारे में साथ ही उन्होंने हिन्दी साहित्य में क्या योगदान दिया है?










तुलसीदास दास जी का जीवन परिचय 

जीवन परिचय-तुलसीदास राम के अनन्य भक्त थे। इनकी जन्म तिथि और जन्म स्थान के बारे में विद्वानों में बड़ा ही मतभेद है। सामान्य रूप से इनका जन्म सन् 1532 ई. में माना जाता है, लेकिन कुछ विद्वान आपका जन्म 1497 ई. में मानते हैं। आपका  जन्म उत्तर प्रदेश के । एक छोटे से गाँव राजापुर में  हुआ था। कुछ विद्वान आपका जन्म सोरों, जिला एटा में मानते हैं।तुलसीदास जी की माता का नाम हुलसी देवी और उनके पिता का नाम आत्माराम दुबे था,  गुरु नरहरिदास ने आपकी पढ़ने की व्यवस्था की । आपका विवाह दीनबन्धु पाठक की पुत्री रत्नावली से हुआ। पत्नी की फटकार से सांसारिक मोह त्यागकर वे अयोध्या आ गए और कालजयी महाकाव्य 'रामचरितमानस' की रचना की। और इस तरह आपने सन् 1623 ई. में काशी में अपने प्राण त्याग दिए

तुलसीदस जी की प्रमुख रचनाएं 

रचनाएं- 

  1.  रामचरितमानस',
  2. 'विनयपत्रिका', 
  3. 'कवितावली', 
  4. 'गीतावली', 
  5. 'दोहावली', 
  6. 'बरवै रामायण', 
  7. 'हनुमान बाहुक',' 
  8. जानकीमंगल' आदि । 


तुलसीदास जी की काव्यगत विशेषताएँ

गोस्वामी तुलसीदास हिंदी साहित्य के उन कवियों में हैं जिन्होंने अपनी कविता से पूरे समाज को दिशा दी। यहाँ पर हम उनकी काव्यगत विशेषताओं को दो भागों में तोड़कर समझेंगे पहला  भावपक्ष (कविता के भाव) और  दूसरा कलापक्ष (कविता की बनावट और भाषा)।

भावपक्ष : - 

(i) भक्ति भावना - तुलसीदास जी सगुण भक्ति धारा को मानने वाले कवि थे, यानी वे राम को साकार रूप में पूजते थे। उनकी भक्ति में अपने आप को बहुत छोटा मानने का भाव (दैन्य) दिखता है। वे खुद को दीन-हीन और राम को अपना सब कुछ मानते हैं। उनके लिए राम ही एकमात्र सहारा हैं, जैसे चातक पक्षी सिर्फ स्वाति नक्षत्र की बूँद पर भरोसा रखता है। इसी बात को उन्होंने इस दोहे में कहा है कि  -

"एक भरोसो एक बल, एक आस विश्वास।
एक राम घनश्याम हित, चातक तुलसीदास॥"

(ii) समन्वयवादी विचार - तुलसीदास जी ने अपने समय की अलग-अलग विचारधाराओं को जोड़ने का काम किया। शैव-वैष्णव, सगुण-निर्गुण और ज्ञान-भक्ति के झगड़ों को उन्होंने मिलाकर देखा। खुद रामभक्त होते हुए भी उन्होंने शिव, पार्वती, गणेश, सूर्य और गंगा जैसे सभी देवी-देवताओं की वंदना की। उनके काव्य से हमें अपना कर्तव्य निभाने और सबकी भलाई करने की सीख मिलती है। 

(iii) लोकमंगल का भाव - तुलसी के काव्य का मूल उद्देश्य समाज का भला करना है। उनकी नज़र में राम का प्रेम ऊँच-नीच नहीं देखता। इसीलिए उन्होंने भील, कोल और शबरी जैसे साधारण लोगों को भी राम का अपना बताया। शबरी के जूठे बेर खाने वाला प्रसंग इसका सबसे अच्छा उदाहरण है।

(iv) रस-निरूपण - तुलसी रससिद्ध कवि हैं, यानी उन्हें भावों को कविता में उतारने की कला अच्छी तरह आती थी। उनकी रचनाओं में शृंगार, शांत और वीर रस बहुत सुंदर ढंग से आए हैं। इनके साथ रौद्र, करुण और अद्भुत रस भी मिलते हैं। सीता-राम के मिलन में शृंगार है, लंका-कांड के युद्ध में वीर रस है और दशरथ के प्राण त्यागने के प्रसंग में करुण रस है।

कलापक्ष :-

(i) भाषा - तुलसीदास जी ने मुख्य रूप से अवधी और ब्रज भाषा में लिखा। रामचरितमानस अवधी में है, जबकि कवितावली, गीतावली और विनयपत्रिका ब्रज भाषा में हैं। कहीं-कहीं उनकी कविता में अरबी, फ़ारसी, भोजपुरी और बुंदेलखंडी के शब्द भी आ जाते हैं। इससे उनकी भाषा आम लोगों की बोली के काफ़ी करीब लगती है।

(ii) अलंकार योजना - तुलसी का अलंकार-विधान बहुत सुंदर है। उन्होंने सिर्फ़ उपमा अलंकार का ही सहारा नहीं लिया। कहीं रूपक है, कहीं उत्प्रेक्षा और कहीं दृष्टांत। ये अलंकार कविता को सजाते भी हैं और बात को समझाने में भी मदद करते हैं।

(iii) छंद- उन्होंने अलग-अलग तरह के छंदों में रचना की। चौपाई, दोहा, पद, सवैया और कवित्त उनके प्रमुख छंद हैं। हर छंद का उपयोग उन्होंने उसी जगह किया जहाँ वह भाव के हिसाब से सबसे ठीक बैठता था।

(iv) शैली - तुलसीदास ने प्रबंध और मुक्तक, दोनों शैलियों में लिखा। रामचरितमानस प्रबंध शैली का उदाहरण है, जिसमें पूरी कथा क्रम से चलती है। दोहावली और विनयपत्रिका के पद मुक्तक शैली में हैं, जहाँ हर छंद या पद अपने आप में पूरा होता है।


तुलसीदास जी का साहित्य में स्थान

साहित्य में स्थान - तुलसीदास जी ने जो भी लिखा, लोगों की भलाई की भावना से लिखा। इसी कारण वे सिर्फ़ भारत में नहीं, पूरी दुनिया में जाने जाते हैं। उनके बारे में यह कथन बहुत प्रसिद्ध है - 
"कविता करके तुलसी न लसे, कविता लसी या तुलसी की कला।"
यानी तुलसी कविता करके शोभित नहीं हुए, बल्कि तुलसी की कला को पाकर कविता खुद शोभित हो गई। सच में तुलसीदास हिंदी साहित्य के ऐसे अमर कवि हैं जिनका नाम आज भी उतने ही सम्मान से लिया जाता है।


तुलसी दास जी का संक्षिप्त में कवि परिचय 

                                                    अगर आप चाहें तो दूसरे तरीके से भी संक्षिप्त में तुलसीदास जी का कवि परिचय लिख सकते हैं, क्योंकि परीक्षाओं में अक्सर ऐसा पूछा जाता है कि तुलसीदास जी का परिचय निम्न बिंदुओं के आधार पर दीजिए। बिंदुओं में दो रचनाएँ, भाव पक्ष, कला पक्ष और साहित्य में स्थान पूछा जाता है। तो यहाँ पर इन्हीं बिंदुओं को कवर करते हुए दो रचनाएँ, भाव पक्ष, कला पक्ष, साहित्य में स्थान के आधार पर आपको संक्षिप्त में तुलसीदास जी का कवि परिचय दिया गया है। तो यहाँ से आप इस तरीके से भी लिख सकते हैं, जिससे आपको परीक्षा के अनुसार पूरे नंबर मिलेंगे।

दो रचनाएं - रामचरितमानस, दोहावली, कवितावली, पार्वती मंगल, गीतावली आदि ।

भाव-पक्ष - तुलसीदास जी की रचनाओं में प्रेम और भक्ति भावना का गहरा चरित्र चित्रण मिलता है। इनकी रचनाओं में संघर्ष, धार्मिकता और नैतिकता के महत्व को भली-भांति प्रस्तुत किया गया है । तुलसीदास जी ने श्री राम की जीवन गाथा और उनके तत्वों तथा आदर्शों को अपने काव्य में दर्शाया है ।

कलापक्ष - तुलसीदास की काव्यात्मक शैली सरल और सरस है। उन्होंने अपने काव्य में अवधी भाषा का प्रयोग किया है । इनके काव्य में और भी अन्य भाषाओं के शब्द-विचार देखने को मिलते हैं । तुलसीदास के काव्य में छंदों का अति सुंदर प्रयोग देखने को मिला है, मुख्य रूप से इनके काव्य में दोहा, चौपाई, सोरठा आदि छंद प्रयोग किए गए हैं, जो जन-जन को लोकप्रिय हैं।

साहित्य में स्थान - गोस्वामी तुलसीदास जी को भक्तिकाल की सगुण भक्ति धारा के श्रेष्ठ कवि के रूप में जाना जाता है । तुलसीदास जी का हिन्दी साहित्य में एक महत्वपूर्ण स्थान है । 

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